जम्मू-कश्मीर का कुपवाड़ा कैसे बना अखरोट का गढ़?

जम्मू-कश्मीर का अखरोट

जम्‍मू-कश्‍मीर के कुपवाड़ा में सुरक्षाबलों ने मंगलवार को 2 आतंकियों को मार गिराया. आतंकियों ने यहां घुसपैठ की कोशिश की थी. कुपवाड़ा जम्‍मू-कश्‍मीर का वो हिस्‍सा है जिसे वॉलनट सिटी यानी अखरोट का शहर कहा जाता है. कुपवाड़ा को यूं नहीं अखरोट का गढ़ कहा जाता है. इसके पीछे कई कारण हैं. दिलचस्‍प बात है कि इसी अखरोट की लकड़ी से नक्‍काशीदार फर्नीचर तैयार किए जाते हैं. जानिए, कुपवाड़ा कैसे बना अखरोट का गढ़.

कुपवाड़ा कैसे बना अखरोट का गढ़: कुपवाड़ा के अखरोट का गढ़ बनने के पीछे एक बड़ी वजह है इसकी लोकेशन. यह समुद्र तल से 5000 से 8000 फीट की ऊंचाई पर है. इसलिए यहां की जलवायु इसकी पैदावार के लिए परफेक्‍ट मानी जाती है. यहां की उपजाऊ मिट्टी और इसके बीजों के कलेक्‍शन ने बेहतर किस्‍म के अखरोट की पैदावार को बनाए रखा. यहां के लोगों की घरेलू नर्सरी ने इस क्षेत्र को अखरोट का गढ़ बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई.

इसलिए भी बढ़ता गया दायरा: जम्‍मू-कश्‍मीर को भारत का प्रमुख अखरोट उत्‍पादक राज्‍य यूं ही नहीं कहा जाता. कुपवाड़ा ने बड़े पैमाने पर अखरोट की पैदावार देकर अखरोट के गढ़ की छवि को तैयार किया है. दिलचस्‍प बात है कि कुपवाड़ा के लिए अखरोट की खेती सिर्फ पैदावारभर नहीं है. यह यहां के लोगों की आय को कई तरह से बढ़ाता है. अखरोट के व्‍यापार के साथ इसकी लकड़ी का इस्‍तेमाल फर्नीचर बनाने में किया जाता है. जो लोगों की आमदनी का बड़ा जरिया भी है.

अखरोट का कितना उत्‍पादन: कुपवाड़ा की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, यहां साल 2024 में 30,894 मीट्रिक टन अखरोट का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ. यहां अखरोट के खेत 8,820 हेक्टेयर भूमि पर फैले है. अखरोट का दायरा बढ़ाने के लिए सरकार ने दो मॉडल हाई-टेक अखरोट केंद्र स्थापित किए. कुपवाड़ा जिले के सोगाम और जिरहामा में अखरोट प्रसंस्करण इकाइयां (ॅच्न्) लगाई गई हैं. इनका मकसद अखरोट प्रॉसेस‍िंग की क्षमताओं को बढ़ाना है.

कितनी चुनौतियां: बेशक कुपवाड़ा अखरोट का गढ़ है, लेकिन इसके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं. हाल के सालों मार्केटिंग, प्रोडक्‍टशन पशु-कीट और पर्यावरण से जुड़ी दिक्‍कतों का असर इस पर भी हुआ है. हालांकि, अभी भी यह अखरोट के प्रोडक्‍शन और उससे तैयार होने वाले उत्‍पादों पर पकड़ बनाए हुए है.

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