जब कृपा राम जी की होती है तब संत अनुकूल मिलते है। राम और रामायण को जीवन में धारण करेंगे तो ही पुरूषार्थ यानि धर्म के मार्ग पर चल पाएंगे।
रामायण के अरण्यकाण्ड में एक बार श्री लक्ष्मण जी ने प्रभु श्रीराम जी से पूछा कि हे प्रभो! ज्ञान, वैराग्य और माया का वर्णन कीजिए और उस भक्ति को कहिए जिसके कारण आप जीवों पर दया करते है तथा साथ ही आत्मा और जीव के भेद को समझाकर कहिए, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा बहा नष्ट हो जाए। श्रीराम जी ने कहा हे तात! मैं थोडे में ही सब कुछ समझाकर कह देता हूँ। तुम मन, बुद्धि और चित्त को लगाकर सुनो। मैं और मेरा, तू और तेरा-यही माया है, जिसने समस्त जीवों को अपने वश में कर रखा है। इसी कारण ये जीव मोह-माया के इस अंधे कुंए में पड़ा हुआ है। जो कलयुग के इस वर्तमान दौर में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। नाम परमार्थ का और काम स्वार्थ का, बात धर्म की और काम अधर्म का। रामायण में भगवान श्रीराम ने भक्ति को स्वतंत्र कहा है। ज्ञान और विज्ञान इस भक्ति के अधीन होते है और ये भक्ति तभी मिलती है जब संत अनुकूल हो। जब कृपा राम जी की होती है तब संत अनुकूल मिलते है। राम और रामायण को जीवन में धारण करेंगे तो ही पुरूषार्थ यानि धर्म के मार्ग पर चल पाएंगे।
अब बात करते है शीर्षक यानि पुरूषार्थ और परमार्थ की। चार युगों में अगर देखें तो सतयुग में धर्म चार पाँव पर, त्रेता में तीन पांव पर, द्वापर में दो पांव पर और आज कलयुग में धर्म एक पांव पर खड़ा है। परमात्मा ने तो चार वर्ण ही बनाए थे परन्तु आज वर्णों का स्थान जातियों ने और धर्म का स्थान सम्प्रदाय ने ले लिया है। इसी कारण हम राह से भटके हुए मुसाफिर हो गए है।
रास्ते कितने ही क्यों न हो, कैसे भी क्यों न हो परन्तु मंजिल सभी की एक ही होती है। अक्सर हम अपने दैनिक जीवन में धर्म-संकट में है, सत्तग्रह और कानून अंधा है जैसे शब्दों को सुनते है। ये सभी बातें सच के विपरित है, इनमें पूरी तरह झूठ ही झूठ है। क्योंकि धर्म कभी संकट मे हो ही नहीं सकता। धर्म पर चलने वाला प्राणी गाय की पूँछ पकड़कर यानि धर्म का सहारा लेकर इस पाप के सागर को पार कर जाता है तो धर्म कैसे संकट में होगा। इसी प्रकार सत्य कभी आग्रह नहीं करता। सच तो दूध का दूध और पानी का पानी करता है। कानून अंधा है, ये हम कब से सुनते आ रहे हैं। कानून अगर अंधा होता तो घोटाले पे घोटाले और महाघोटाले आज उजागर नहीं होते। कानून की अपनी नजर होती है और इसी कारण कल के रथी और महारथी, धर्म के ठेकेदार और राजनीति के खिलाड़ी या फिर पर्दे पर चमकने वाले सितारे ही क्यों न हो, आज वो सलाखों के पीछे पहुँच गए हैं। परमार्थ के लिए भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि इस संसार को मैने मेरे अंश के एक अंश मात्र से धारण किया हुआ है। इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे मैं प्राप्त करना चाहूँ और उसे प्राप्त ना कर सकूं। हे पार्थ ! फिर भी मैं तेरा सारथी बनकर कर्म कर रहा हूँ, इसलिए अर्जुन ! तू अपने कर्म से मत भाग और युद्ध कर। परमार्थ न अपने लिए होता है और न ही अपनों के लिए। परहित के कार्यों में अपने जीवन को न्यौछावर कर देने वाला, मान-सम्मान से ऊपर उठकर दूसरों के कल्याण में लीन रहने वाला परमार्थी कहलाता है। इस दृष्टि से भगवान श्रीकृष्ण इस संसार के सबसे बड़े परमार्थी हैं।
उन्होंने धर्म से ऊपर उठकर ज्ञान का ऐसा दीप जलाया कि जिसकी आभा से हजारों-हजार साल बाद भी सारा संसार रोशन हो रहा है। उन्होने सुदामा से मित्रता का धर्म निभाकर गरीब-अमीर का भेद मिटाया। द्रोपदी की लाज बचाकर स्त्री जाति का मान बढ़ाया। महाभारत के युद्ध में धर्म और अधर्म को न देखकर पाप की समाप्ति के लिए केवल युद्ध नीति को अपनाया, फिर चाहे वो अश्वथामा के मारे जाने की झूठी बात कहकर गुरू द्रोणाचार्य का वध करवाने की बात हो, निहत्थे कर्ण को मरवाने की बात हो, शिखंडी को आगे कर भीष्म पितामाह को तीरों से छलनी करने की बात हो या फिर युद्ध में हथियार न उठाने के वचन को तोड़ने की बात हो, उन्होंने युद्ध में जैसे को तैसे की नीति अपनाकर न कोई नियम न कोई कायदा और न ही मर्यादा की परवाह की। आज हमें देश और धर्म के लिए श्रीकृष्ण जी की नीति को अपनाना होगा। अतः हम कह सकते है कि पुरूषार्थ धर्म है तो परमार्थ ज्ञान।
।। जय श्री राम ।।
लेखक: रोशनलाल गोरखपुरिया
