हर स्टूडेंट को देखनी चाहिए ‘आर्यभट्ट का जीरो’

New Delhi : बॉलीवुड में जब आम आदमी की नाकामियों, समाज के तानों और आत्मसम्मान की लड़ाई को सच्चाई के साथ दिखाया जाता है, तो वह कहानी सीधे दर्शकों के दिल तक पहुंचती है। ‘12th Fail’ के बाद इसी तरह की एक और फिल्म ‘आर्यभट्ट का जीरो’ सामने आई है। कमल चंद्रा के निर्देशन में बनी यह फिल्म असफलता के डर और सफलता को लेकर समाज की बनाई धारणाओं पर सवाल उठाती है। फिल्म पूछती है—क्या किसी इंसान की कीमत उसके परीक्षा के नंबर, नौकरी या डिग्री से तय हो सकती है?

कहानी

फिल्म की शुरुआत दिल्ली के मुखर्जी नगर की सड़कों पर एक रोमांचक दृश्य से होती है, जहां एक युवक पुलिस से बचकर भाग रहा है। यहीं से मुलाकात होती है ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव उर्फ बग्गू (हिमांश कोहली) से। उत्तराखंड के एक लोअर-मिडिल-क्लास परिवार से आने वाला बग्गू बेरोजगार है और जिंदगी में लगातार असफलताओं का सामना कर रहा है। उसके पिता आर्यभट्ट श्रीवास्तव (नीरज सूद) सरकारी दफ्तर में क्लास-IV कर्मचारी हैं और बेटे को सफल होते देखना चाहते हैं। बग्गू की जिंदगी तब और उलझ जाती है, जब उसकी प्रेमिका रिंकू (सोनाली सहगल) उसे छोड़कर एक शादीशुदा SDM अधिकारी से शादी कर लेती है। आहत बग्गू उससे बड़ा अधिकारी बनने की जिद में UPSC की तैयारी शुरू करता है। लेकिन बार-बार की असफलताएं उसे तोड़ने लगती हैं। रिश्तेदारों और पड़ोसियों के ताने और पिता का टूटता भरोसा उसे इतना प्रभावित करते हैं कि वह खुद को ‘जीरो’ मानने लगता है। यहीं फिल्म का असली सवाल सामने आता है—क्या समाज का दिया हुआ ‘जीरो’ किसी इंसान की असली पहचान हो सकता है?

निर्देशन और लेखन

कमल चंद्रा ने कहानी को काफी हद तक वास्तविक और सहज रखा है। पहला हाफ हल्के-फुल्के हास्य के साथ बग्गू की नाकामियों और मुखर्जी नगर के संघर्ष को दिखाता है, जबकि दूसरा हिस्सा ज्यादा भावुक और आत्मनिरीक्षण वाला हो जाता है। लेखक तारिक मोहम्मद ने खास तौर पर पिता-पुत्र के रिश्ते को संवेदनशीलता से उभारा है। उनके बीच की खामोशी, उम्मीद और टूटता भरोसा फिल्म को भावनात्मक गहराई देता है।

अभिनय

हिमांश कोहली बग्गू के किरदार में अपनी बेबसी, गुस्से और मासूमियत को प्रभावी ढंग से सामने रखते हैं। नीरज सूद पिता की भूमिका में खास तौर पर प्रभावित करते हैं। पिता और बेटे के बीच के दृश्य फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं। रवि किशन अपने देसी अंदाज से कहानी में मनोरंजन जोड़ते हैं, जबकि सोनाली सहगल और बाकी कलाकारों ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

अंतिम फैसला

‘आर्यभट्ट का जीरो’ सिर्फ एक बेरोजगार युवक की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम युवाओं की कहानी है जो दूसरों की नजर से खुद को आंकने लगते हैं। फिल्म का सबसे खूबसूरत संदेश यही है कि जीरो अंत नहीं, एक नई शुरुआत भी हो सकता है। अगर आप सफलता की अंधी दौड़ से थक चुके हैं, तो यह फिल्म आपको एक पल रुककर खुद को देखने का मौका देती है। हर स्टूडेंट को इसलिए इसे एक बार जरूर देखना चाहिए।

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