क्या है सोहर? लड़कियों के जन्म पर क्यों नहीं गाती महिलाएं गीत

भारत की लोक परंपराएं सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं रही हैं, बल्कि इनमें समाज की सोच, मान्यताएं और सदियों पुराने रीति-रिवाज भी छिपे हुए हैं. ऐसी ही एक लोक परंपरा है ‘सोहर’, जिसे बच्चे के जन्म के अवसर पर महिलाओं द्वारा गाया जाता है. खासकर उत्तर भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और आसपास के इलाकों में सोहर की परंपरा काफी प्रचलित रही है. लेकिन इस परंपरा से जुड़ा एक दिलचस्प सवाल अक्सर उठता है कि बेटे के जन्म पर सोहर गाने की परंपरा ज्यादा क्यों रही और बेटी के जन्म पर क्यों नहीं? 

क्या होता है सोहर? 

‘सोहर’ मूल रूप से प्रसव और नवजात के जन्म से जुड़ा लोकगीत है. बच्चे के जन्म के बाद घर की महिलाएं एक साथ बैठकर गीत गाती हैं, जिसमें नवजात के जन्म की खुशी, मां की पीड़ा, परिवार की भावनाएं और देवी-देवताओं का स्मरण शामिल होता है. इन गीतों में कई बार राम, कृष्ण, शिव-पार्वती और अन्य धार्मिक पात्रों के प्रसंग भी आते हैं. लोकभाषा और क्षेत्र के अनुसार सोहर के बोल और धुन बदलते रहते हैं. यानी सोहर किसी एक गीत का नाम नहीं, बल्कि जन्म के अवसर पर गाई जाने वाली लोकगीतों की एक पूरी परंपरा है.

बेटी के जन्म पर सोहर क्यों नहीं?

इस सवाल का जवाब परंपरा से ज्यादा उस पुराने सामाजिक ढांचे में छिपा है, जिसमें सोहर की परंपरा विकसित हुई. सदियों तक भारतीय समाज के कई हिस्सों में पुत्र को परिवार का वंश आगे बढ़ाने वाला, आर्थिक सहारा और धार्मिक कर्मकांडों का उत्तराधिकारी माना जाता रहा. इसके विपरीत बेटी को विवाह के बाद दूसरे परिवार में जाने वाली संतान समझा जाता था. दहेज, विवाह का खर्च और पितृसत्तात्मक पारिवारिक व्यवस्था जैसी धारणाओं ने भी बेटी के जन्म को कई जगह बेटे की तरह उत्सव का अवसर नहीं बनने दिया.

इसी सामाजिक मानसिकता का असर लोकगीतों पर भी पड़ा. इसलिए कई क्षेत्रों में बेटे के जन्म पर विशेष रूप से सोहर गाने की परंपरा मजबूत हुई. हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि हर जगह बेटी के जन्म पर सोहर नहीं गाया जाता. अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों में परंपराएं काफी अलग हैं और समय के साथ उनमें बदलाव भी आया है.

सोहर में छिपा है समाज का इतिहास

लोकगीतों की सबसे खास बात यह है कि वे उस दौर की सामाजिक सोच को सुरक्षित रखते हैं, जब उन्हें रचा और गाया गया था. पुराने सोहरों में जहां बेटे के जन्म को परिवार की खुशहाली और वंश बढ़ाने से जोड़ा जाता है, वहीं, अब कई लोकगीतों में बेटी के जन्म को भी खुशी और सौभाग्य का प्रतीक बताया जाने लगा है.

इस बदलाव की वजह शिक्षा, महिलाओं की बढ़ती सामाजिक-आर्थिक भागीदारी और बेटियों को लेकर बदलती सोच है. अब कई परिवार बेटी के जन्म पर भी उसी तरह उत्सव मनाते हैं जैसे बेटे के जन्म पर. बिल्कुल. सोहर केवल बेटे के जन्म की खुशी का गीत नहीं, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति और मौखिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है. 

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